शुक्रवार, 21 फ़रवरी 2014

शेयरिंग ऑटो

शेयरिंग ऑटो, विक्रम, भट..... न जाने कितने नाम. मुझे पूरा यकीन है कि हिंदुस्तान के हर औसत व्यक्ति ने इस शेयरिंग ऑटो का कभी न कभी इस्तेमाल किया ही है. औसत इसलिए क्यूंकि बहुत से लोग ऐसे भी है जो इतने भी पैसे नहीं बचा पाते और बहुत से ऐसे जो पैसो को पचा नहीं पाते, खेर ये topic फिर कभी.

हाँ तो मैं शेयरिंग ऑटो के बारे में बात कर रहा था, मुझे अलग अलग प्रदेशो में इस सवारी का आनंद लेने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। 

तो जी हैदराबाद में जब में नौकरी किया करता था (जो में अब भी करता हूँ), मेरा ऑफिस आना जाना शेयरिंग ऑटो से हुआ करता था।  आप सोच रहे होंगे कि ये ऑटो कुछ अलग होता होगा, लेकिन यही आप कि सोच मात खा जाती है, ये हमारा नॉर्मल ऑटो था फर्क सिर्फ इतना कि यहाँ ३ सीटो कि जगह न जाने कितनी सवारियां बिठा ली जाती थी।  यही नहीं, अगर आप इस ऑटो को बाहर से देखे तो यह पहचानना मुश्किल हो जाता था कि सामने बैठे हुए ४ लोगो में ऑटो कौन चला रहा है और सवारी कौन है।

खेर हैदराबाद छोड़ने के बाद वैसे ऑटो के कभी दर्शन नहीं हुए।  पुणे शहर के शेयरिंग ऑटो थोड़े बड़े होते है।  और शेयरिंग ऑटो कहलाने लायक भी, लेकिन दिक्कत यहाँ ये है कि अगर आप गलती से इनके पीछे अपनी two wheeler से जा रहे है, तो आप सीधे यमराज या नंदी का रोले करने जा सकते है।  और वोह इसलिए, क्यूंकि आपको कोई एडिशनल कालिख पोतने कि जरूरत नहीं पड़ेगी।

चलिए अब आ जाये अपने भोपाल मे।  आजकल यहाँ बड़े सुन्दर दिखने वाले शेयरिंग ऑटो चला करता है जो ऑटो कम और खुली nano ज्यादा जान पड़ते है।  लेकिन एक समय ऐसा था जब यहाँ लम्बी नाक वाले शेयरिंग ऑटो चला करता है जिन्हे उनकी ऐसी नाक के चलते 'भट सूअर' भी कहां जाता था।

इसी तरह इलाहाबाद में चलने वाले शेयरिंग ऑटो को विक्रम कहाँ जाता था।  असल में उस ऑटो का मेक याने कि मॉडल 'विक्रम' था।

ये तो कुछ शहरो कि बात है,  पुरे हिंदुस्तान कि बात करे तो न जाने कितने मॉडल और न जाने कितनी कहानियां जुडी है इन शेयरिंग ऑटो से.… सही बोल्लेया हूँ कि नहीं खां !

शुक्रवार, 13 सितंबर 2013

ज़ेब्रा क्रासिंग


आज  ऑफिस जाने के  रास्ते  मे पड़ने वाले एक सिग्नल पर  जब bike रोकी तो अनायास ही एक sign बोर्ड पर नजर पड़ी, जिस पर लिखा था की गाडी ज़ेब्रा क्रासिंग पर न रोके।

फटाफट नजर दौडाई तो पता चला की बड़े सारे साहब लोगो ने बोर्ड लगाने वाले से किसी ज़ाती दुश्मनी के चलते, उस बोर्ड को और उसे लगाने वाले को चिढ़ाने के मकसद से, गाड़ी ठीक उस ज़ेब्रा क्रासिंग पर ही  ला धरी थी , क्या कहाँ ?, कैसी दुश्मनी,  अरे खां मुझे नहीं मालूम, अब दुश्मनी के अलावा इतनी सी बात न मानने का लॉजिक अपने पास नहीं

बहरहाल, इस ज़ेब्रा क्रासिंग से  याद आया की कैसे हमारे बचपन में इस क्रासिंग का क्या excitement होता  था, स्कूल में लंच के दौरान या फिर हर क्लास के बाद होने वाले बेहद important discussions में ये भी शामिल था। ………… "तुझे पता है मेरे चाचा के शहर में हर चोराहे पर ज़ेब्रा क्रासिंग होती है", "अरे ये ज़ेब्रा क्रासिंग पे पाँव रखते बराबर गाड़ियाँ अपने आप रुक जाती है", और कई बार कोई ज्ञानी मित्र ये भी कहते हुए पाया जाता था की भाई "ये तो जंगल में भी होती है और वहां सचमुच के ज़ेबरा चलते है, इसिलए उसे ज़ेब्रा क्रासिंग कहते है".

यही सब सोचते सोचते ऑफिस  पहुच गया और फिर लगा की ये जो महानुभाव जो हमारे ज़ेब्रा के ऊपर गाड़ी ठेले खड़े थे, उनके बचपन में शायद ही ऐसी वाहियात बातों पर discussions हुए होंगे। शायद हम ही इतने गए गुजरे थे और शायद हमारे  जैसे या फिर समकालीन बच्चे जो अब युवा हो कर बुढ़ापे की तरफ अग्रसर है आखरी  मुर्ख है जो इन बातो, बोर्डो या ज़ेब्राओं से इतनी मुहोब्बत या इत्तेफाक रखते है.

तो फिर  मेरे समकालीन दोस्तों की तरफ से और उनके लिए - "ज़ेब्रा क्रासिंग अमर रहे!"

गुरुवार, 22 अगस्त 2013

जय escalation बाबा ||


जय escalation बाबा, दादा जय escalation बाबा
तुम से सब घबडाते ,  बाबाजी से सब घबडाते, मेनेजर उखड जाते ॥

नाम तुम्हारा ऐसा लगता, नीचे से ऊपर जाते,
बाबा नीचे से ऊपर जाते
प्रगट होते जब लेकिन, प्रगट होते जब लेकिन
ऊपर से नीचे आते, बोलो जय escalation बाबा

जय escalation बाबा, दादा जय escalation बाबा
तुम से सब घबडाते ,  बाबाजी से सब घबडाते, मेनेजर उखड जाते ॥

पाकर तुमको client , मूछ में मुस्काते
बाबा मूछ में मुस्काते 
केवल तुमरे दम पर, बाबाजी तुमरे दम पर
काम टाल जाते, बोलो जय escalation बाबा

जय escalation बाबा, दादा जय escalation बाबा
तुम से सब घबडाते ,  बाबाजी से सब घबडाते, मेनेजर उखड जाते ॥

IT के सब पुर्जे, तुम से कस जाते,
बाबा तुम से कस जाते
Banding में जब आते, Banding में जब आते
Band बजा जाते, बोलो जय escalation बाबा

जय escalation बाबा, दादा जय escalation बाबा
तुम से सब घबडाते ,  बाबाजी से सब घबडाते, मेनेजर उखड जाते ॥

सोमवार, 19 अगस्त 2013

रवीश जी का सुन्दर लेख

रवीश जी का बहुत ही सुन्दर लेख है, जरूर पढ़े:

अगर कुछ पोज़िटिव लिखना हो तो

http://naisadak.blogspot.in/2013/08/blog-post_16.html


कमेंट कमेंट ....Comment Comment

कमेंट  कमेंट  कमेंट। …कीजिये कमेंट, दीजिये कमेंट, लीजिये कमेंट, क्यूंकि कमेंट के लिए हम बेकरारार है। अरे भाई बिना कमेंट के पाटिया भी कोई पाटिया है तो इसलिए कमेंट करना और भी आसान बना रिया हूँ आपके लिए।

बहरहाल, आज डॉलर (बनियान नहीं, american dollar  भाई) ने कमाल कर दिया है, 65 रुपे के बराबर हो गया है भाई, हम भी बड़े negative हो चले है आजकल सिर्फ ये देखते है की रूपया गिर रहा है, अरे ये सोचे की डॉलर कितना उठ रहा है, मेरे बहुत से मित्र जो अमेरिका में खून पसीने से पैसा कम रहे है आज कितने खुश होंगे।

चलिए तो अब इसी बात पे कमेंट कर दीजिये, अबे इस नए ब्लॉगर का कुछ उत्साहवर्धन तो करो यार !!


शुक्रवार, 16 अगस्त 2013

पहला पहला ब्लॉग है ….ssss


हाँ तो भई, आ गया एक भोपाली ब्लॉग मार्केट मे.…. और किसी से भी ज्यादा मुझे खुद ही इस ब्लॉग का इंतज़ार था ।  क्या कहाँ,  क्यूँ, अरे भाई पटिया अब भोपाल से गायब सा हो रहा है, अब आधी रात हमारे पुलिस वाले कहाँ गप मारने  देते है। …. लेकिन ये ऑनलाइन पटिया है जब चाहे आ कर बैठ गए और बक दिया कुछ भी अंड बंड। 

वाह वाह भी होगी, गालिया भी मिलेंगी और ताने भी कसे जायेंगे। भई वाह, मज़ा आ जायेगा, चाय बिस्कुट मिले न मिले लेकिन बातों का स्वाद तो मिलेगा ही। 

अरे हाँ , ये ना समझे की यहाँ सिर्फ भोपाली allowed है । अरे खां ऐसे भी कभी भोपाल में हुआ है भला, यहाँ सब allowed है। जी हाँ पटिया सब का है और सब इसके । तो आइये फिर जुड़ जाइये इस भोपाली और उसके पटिये के साथ.…खुशामदीद ।