आज ऑफिस जाने के रास्ते मे पड़ने वाले एक सिग्नल पर जब bike रोकी तो अनायास ही एक sign बोर्ड पर नजर पड़ी, जिस पर लिखा था की गाडी ज़ेब्रा क्रासिंग पर न रोके।
फटाफट नजर दौडाई तो पता चला की बड़े सारे साहब लोगो ने बोर्ड लगाने वाले से किसी ज़ाती दुश्मनी के चलते, उस बोर्ड को और उसे लगाने वाले को चिढ़ाने के मकसद से, गाड़ी ठीक उस ज़ेब्रा क्रासिंग पर ही ला धरी थी , क्या कहाँ ?, कैसी दुश्मनी, अरे खां मुझे नहीं मालूम, अब दुश्मनी के अलावा इतनी सी बात न मानने का लॉजिक अपने पास नहीं
बहरहाल, इस ज़ेब्रा क्रासिंग से याद आया की कैसे हमारे बचपन में इस क्रासिंग का क्या excitement होता था, स्कूल में लंच के दौरान या फिर हर क्लास के बाद होने वाले बेहद important discussions में ये भी शामिल था। ………… "तुझे पता है मेरे चाचा के शहर में हर चोराहे पर ज़ेब्रा क्रासिंग होती है", "अरे ये ज़ेब्रा क्रासिंग पे पाँव रखते बराबर गाड़ियाँ अपने आप रुक जाती है", और कई बार कोई ज्ञानी मित्र ये भी कहते हुए पाया जाता था की भाई "ये तो जंगल में भी होती है और वहां सचमुच के ज़ेबरा चलते है, इसिलए उसे ज़ेब्रा क्रासिंग कहते है".
यही सब सोचते सोचते ऑफिस पहुच गया और फिर लगा की ये जो महानुभाव जो हमारे ज़ेब्रा के ऊपर गाड़ी ठेले खड़े थे, उनके बचपन में शायद ही ऐसी वाहियात बातों पर discussions हुए होंगे। शायद हम ही इतने गए गुजरे थे और शायद हमारे जैसे या फिर समकालीन बच्चे जो अब युवा हो कर बुढ़ापे की तरफ अग्रसर है आखरी मुर्ख है जो इन बातो, बोर्डो या ज़ेब्राओं से इतनी मुहोब्बत या इत्तेफाक रखते है.
तो फिर मेरे समकालीन दोस्तों की तरफ से और उनके लिए - "ज़ेब्रा क्रासिंग अमर रहे!"