शेयरिंग ऑटो, विक्रम, भट..... न जाने कितने नाम. मुझे पूरा यकीन है कि हिंदुस्तान के हर औसत व्यक्ति ने इस शेयरिंग ऑटो का कभी न कभी इस्तेमाल किया ही है. औसत इसलिए क्यूंकि बहुत से लोग ऐसे भी है जो इतने भी पैसे नहीं बचा पाते और बहुत से ऐसे जो पैसो को पचा नहीं पाते, खेर ये topic फिर कभी.
हाँ तो मैं शेयरिंग ऑटो के बारे में बात कर रहा था, मुझे अलग अलग प्रदेशो में इस सवारी का आनंद लेने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है।
तो जी हैदराबाद में जब में नौकरी किया करता था (जो में अब भी करता हूँ), मेरा ऑफिस आना जाना शेयरिंग ऑटो से हुआ करता था। आप सोच रहे होंगे कि ये ऑटो कुछ अलग होता होगा, लेकिन यही आप कि सोच मात खा जाती है, ये हमारा नॉर्मल ऑटो था फर्क सिर्फ इतना कि यहाँ ३ सीटो कि जगह न जाने कितनी सवारियां बिठा ली जाती थी। यही नहीं, अगर आप इस ऑटो को बाहर से देखे तो यह पहचानना मुश्किल हो जाता था कि सामने बैठे हुए ४ लोगो में ऑटो कौन चला रहा है और सवारी कौन है।
खेर हैदराबाद छोड़ने के बाद वैसे ऑटो के कभी दर्शन नहीं हुए। पुणे शहर के शेयरिंग ऑटो थोड़े बड़े होते है। और शेयरिंग ऑटो कहलाने लायक भी, लेकिन दिक्कत यहाँ ये है कि अगर आप गलती से इनके पीछे अपनी two wheeler से जा रहे है, तो आप सीधे यमराज या नंदी का रोले करने जा सकते है। और वोह इसलिए, क्यूंकि आपको कोई एडिशनल कालिख पोतने कि जरूरत नहीं पड़ेगी।
चलिए अब आ जाये अपने भोपाल मे। आजकल यहाँ बड़े सुन्दर दिखने वाले शेयरिंग ऑटो चला करता है जो ऑटो कम और खुली nano ज्यादा जान पड़ते है। लेकिन एक समय ऐसा था जब यहाँ लम्बी नाक वाले शेयरिंग ऑटो चला करता है जिन्हे उनकी ऐसी नाक के चलते 'भट सूअर' भी कहां जाता था।
इसी तरह इलाहाबाद में चलने वाले शेयरिंग ऑटो को विक्रम कहाँ जाता था। असल में उस ऑटो का मेक याने कि मॉडल 'विक्रम' था।
ये तो कुछ शहरो कि बात है, पुरे हिंदुस्तान कि बात करे तो न जाने कितने मॉडल और न जाने कितनी कहानियां जुडी है इन शेयरिंग ऑटो से.… सही बोल्लेया हूँ कि नहीं खां !
हाँ तो मैं शेयरिंग ऑटो के बारे में बात कर रहा था, मुझे अलग अलग प्रदेशो में इस सवारी का आनंद लेने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है।
तो जी हैदराबाद में जब में नौकरी किया करता था (जो में अब भी करता हूँ), मेरा ऑफिस आना जाना शेयरिंग ऑटो से हुआ करता था। आप सोच रहे होंगे कि ये ऑटो कुछ अलग होता होगा, लेकिन यही आप कि सोच मात खा जाती है, ये हमारा नॉर्मल ऑटो था फर्क सिर्फ इतना कि यहाँ ३ सीटो कि जगह न जाने कितनी सवारियां बिठा ली जाती थी। यही नहीं, अगर आप इस ऑटो को बाहर से देखे तो यह पहचानना मुश्किल हो जाता था कि सामने बैठे हुए ४ लोगो में ऑटो कौन चला रहा है और सवारी कौन है।
खेर हैदराबाद छोड़ने के बाद वैसे ऑटो के कभी दर्शन नहीं हुए। पुणे शहर के शेयरिंग ऑटो थोड़े बड़े होते है। और शेयरिंग ऑटो कहलाने लायक भी, लेकिन दिक्कत यहाँ ये है कि अगर आप गलती से इनके पीछे अपनी two wheeler से जा रहे है, तो आप सीधे यमराज या नंदी का रोले करने जा सकते है। और वोह इसलिए, क्यूंकि आपको कोई एडिशनल कालिख पोतने कि जरूरत नहीं पड़ेगी।
चलिए अब आ जाये अपने भोपाल मे। आजकल यहाँ बड़े सुन्दर दिखने वाले शेयरिंग ऑटो चला करता है जो ऑटो कम और खुली nano ज्यादा जान पड़ते है। लेकिन एक समय ऐसा था जब यहाँ लम्बी नाक वाले शेयरिंग ऑटो चला करता है जिन्हे उनकी ऐसी नाक के चलते 'भट सूअर' भी कहां जाता था।
इसी तरह इलाहाबाद में चलने वाले शेयरिंग ऑटो को विक्रम कहाँ जाता था। असल में उस ऑटो का मेक याने कि मॉडल 'विक्रम' था।
ये तो कुछ शहरो कि बात है, पुरे हिंदुस्तान कि बात करे तो न जाने कितने मॉडल और न जाने कितनी कहानियां जुडी है इन शेयरिंग ऑटो से.… सही बोल्लेया हूँ कि नहीं खां !
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